समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य में नारी अस्मिता, स्वायत्तता और सामाजिक यथार्थ
डॉ0 अर्चना, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महाविद्यालय, सुकरौली, कुषीनगर
Published Date: 30 October 2025
Issue: Vol. 1 ★ Issue 1 ★ October 2025
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सारांश:

समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य में नारी अस्मिता, स्वायत्तता और सामाजिक यथार्थ का चित्रण अत्यंत सशक्त रूप में उभरा है। आधुनिक कथाकारों ने स्त्री को केवल पारंपरिक गृहिणी या सहायक पात्र के रूप में नहीं, बल्कि संघर्षशील, आत्मनिर्भर और स्वतंत्र चेतना से युक्त व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया है। साहित्य में नारी की आर्थिक, बौद्धिक और सामाजिक स्वायत्तता के विविध आयामों का सजीव चित्रण मिलता है। ग्रामीण और शहरी जीवन के बीच नारी की परिस्थितियों की भिन्नता, उसकी सामाजिक चुनौतियाँ और लैंगिक विविधताओं के संदर्भ में समकालीन कथाएँ वास्तविकता का गहन परिचय कराती हैं। साहित्यिक प्रवृत्तियों में यथार्थपरक कथाएँ, क्रिटिकल फिक्शन, साहसिक आक्रोश और स्मृतियों की संवेदना प्रमुख हैं, जिनसे नारी के संघर्ष और चेतना का विस्तार हुआ है। कथाकारों ने भाषा, संस्कृति और पात्र-निर्माण के माध्यम से नारी के आत्म-स्वर को अभिव्यक्त किया है। यह साहित्य नारी के आत्मनिर्णय, समानता और सामाजिक परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समकालीन कथा-साहित्य नारी को केवल विषय नहीं बल्कि परिवर्तन की वाहक शक्ति के रूप में स्थापित करता है।

Keywords: नारी अस्मिता, स्वायत्तता, सामाजिक यथार्थ, लैंगिक विविधता, आर्थिक स्वावलंबन, यथार्थपरक कथा, समकालीन साहित्य।